महावीर प्रसाद द्विवेदी (जन्म – 15 मई 1864, मृत्यु – 21 दिसंबर 1938) हिंदी साहित्य के एक महान लेखक, आलोचक, अनुवादक, शिक्षक, भाषा-सुधारक एवं दूरदर्शी संपादक थे। वे हिंदी के आधुनिक काल के दूसरे चरण अर्थात “द्विवेदी युग” (1893–1918) के युग-प्रवर्तक माने जाते हैं।
उनके प्रभाव और रचनात्मक प्रयासों ने हिंदी भाषा को शुद्ध, व्याकरणसम्मत, सुसंगठित और अभिव्यंजक बनाया।
हिंदी गद्य का स्थायी स्वरूप निर्धारण, साहित्यिक विधाओं का विस्तार, खड़ी बोली का प्रसार और “सरस्वती” पत्रिका के द्वारा हिंदी साहित्य को नई दिशा देने का श्रेय महावीर प्रसाद द्विवेदी को ही जाता है।
प्रारंभिक जीवन | Early Life
- जन्म : 15 मई 1864, दौलतपुर, रायबरेली, उत्तर प्रदेश
- पिता : पंडित रामसहाय द्विवेदी (ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में सैनिक, बाद में मंदिर के पुजारी)
- परिवार : कन्याकुब्ज ब्राह्मण
उनका जन्म एक साधारण, आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन संस्कारी परिवार में हुआ। बाल्यावस्था से ही उनमें अध्ययन की अद्भुत रुचि थी, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण निरंतर शिक्षा में बाधाएँ आती रहीं।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा : घर पर संस्कृत
- गाँव के स्कूल में : हिंदी और उर्दू
- 13 वर्ष की आयु में रायबरेली जिला स्कूल में प्रवेश
- वहां अंग्रेज़ी व फ़ारसी का अध्ययन
- बाद में उन्नाव, पुरवा (फ़तेहपुर), और फतेहपुर के विद्यालयों में शिक्षा
लेकिन निर्धनता के कारण पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।
रेलवे नौकरी और आत्मनिर्भरता
पढ़ाई छोड़ने के बाद वे बंबई चले गए और:
- तार (टेलीग्राफ) का काम सीखा
- G.I.P. रेलवे (ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे) में 22 रुपये मासिक पर नौकरी मिली
- कड़ी मेहनत और ईमानदारी से धीरे-धीरे 150 रुपये मासिक तक पहुँच गए
- झाँसी में हेड क्लर्क बने
इसी दौरान उन्होंने—
- संस्कृत
- अंग्रेज़ी
- मराठी
- गुजराती
- उर्दू
—का गहन अध्ययन किया।
रेलवे की नौकरी के दौरान भी उनकी साहित्य साधना निरंतर चलती रही।
आत्मसम्मान और नौकरी का त्याग
एक वरिष्ठ अधिकारी से विवाद होने पर उन्होंने स्वाभिमान के कारण नौकरी छोड़ दी।
इसके बाद वे जीवनभर हिंदी साहित्य की सेवा में जुटे रहे।
‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक (1903–1920)
1903 में वे हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ के संपादक बने।
उनके संपादन में—
- ‘सरस्वती’ हिंदी की सबसे लोकप्रिय तथा प्रामाणिक पत्रिका बन गई
- इसमें प्रकाशित उनके निबंध और आलोचनाएँ साहित्यकारों के लिए दिशा-निर्देशक बन गईं
- उन्होंने लेखकों को व्याकरणसम्मत, शुद्ध, तार्किक हिंदी लिखने हेतु प्रेरित किया
द्विवेदी युग का निर्माण इसी पत्रिका के माध्यम से हुआ।
हिंदी भाषा और शैली का परिष्कार
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी भाषा को—
- शुद्ध
- व्यवस्थित
- व्याकरणसम्मत
- सरल
- परिष्कृत
- अभिव्यक्तिपूर्ण
—बनाने का ऐतिहासिक कार्य किया।
उनके पहले हिंदी काव्य में ब्रजभाषा का प्रभुत्व था, लेकिन द्विवेदी जी ने खड़ी बोली को काव्यभाषा के रूप में स्थापित किया।
उनके मार्गदर्शन से—
- मैथिलीशरण गुप्त
- अयोध्यासिंह उपाध्याय “हरिऔध”
जैसे महान कवि खड़ी बोली साहित्य में उभरकर आए।
लेखन, आलोचना और अनुवाद कार्य
द्विवेदी जी एक महान—
- कवि
- निबंधकार
- आलोचक
- अनुवादक
- शोधकर्ता
थे। उन्होंने संस्कृत साहित्य की महान कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया और नई साहित्यिक विधाओं का विस्तार किया।
महत्वपूर्ण रचनाएँ
✔ मौलिक रचनाएँ
- अद्भुत-आलाप
- रसज्ञ रंजन
- साहित्य-सीकर
- विचित्र-चित्रण
- कालिदास की निरंकुशता
- हिंदी भाषा की उत्पत्ति
- साहित्य सन्दर्भ
- सुगंध
- मेरे जीवन की यात्रा
- हंस
✔ अनूदित रचनाएँ
- रघुवंश
- कुमारसम्भव
- वेणीसंहार
- बेकन विचारमाला
- गंगालहरी
- किरातार्जुनीय
- हिन्दी महाभारत
इन रचनाओं ने हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर प्रामाणिकता और समृद्धि दी।
भाषा और शैली की विशेषताएँ
- सरल, सुबोध, शुद्ध खड़ी बोली
- संस्कृत, फारसी, अरबी के सामान्य शब्दों का प्रयोग
- व्याकरणसंगत वाक्य निर्माण
- भावात्मक, आलोचनात्मक, गवेषणात्मक, व्यंग्यात्मक शैली
- बिना कृत्रिमता के सहज अभिव्यक्ति
उनकी भाषा शैली में उनका व्यक्तित्व झलकता है—
सख्त, ईमानदार, तार्किक और साहित्यिक अनुशासन से परिपूर्ण।
व्यक्तित्व और कृतित्व
महावीर प्रसाद द्विवेदी का व्यक्तित्व—
- नैतिक
- आस्तिक
- संयमी
- कर्तव्यपरायण
- लोककल्याणकारी
था।
उन्होंने केवल भाषा और साहित्य को नहीं सुधारा, बल्कि संपूर्ण हिंदी समाज में नैतिक चेतना का संचार किया।
साहित्यकार उनसे प्रशंसा पाने को अपना सौभाग्य समझते थे।
सम्मान और उपाधियाँ
- आचार्य – नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा
- विद्या वाचस्पति – हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा
ये सम्मान उनके साहित्यिक योगदान की स्वीकृति हैं।
मृत्यु
21 दिसंबर 1938 को यह महान साहित्यकार संसार से विदा हो गया,
लेकिन हिंदी साहित्य को वे अमर विरासत दे गए।
