बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ का जीवन परिचय (Pratap Narayan Mishra Biography in Hindi)

बद्रीनारायण चौधरी उपाध्याय ‘प्रेमघन’ (जन्म: 1 सितम्बर 1855 — मृत्यु: 12 मार्च 1922) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रारंभिक जागरण काल के प्रमुख साहित्यकार, निबंधकार, कवि, नाटककार और आलोचक थे। वे भारतेन्दु मंडल के प्रमुख सदस्यों में गिने जाते हैं और हिन्दी एवं संस्कृत के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

हिन्दी में विचारात्मक निबंधों के जनक, खड़ी बोली गद्य के प्रथम आचार्य, और उच्चकोटि के प्रहसन व नाटककार के रूप में प्रेमघन का साहित्यिक व्यक्तित्व हिन्दी आलोचना के इतिहास में अत्यंत विशिष्ट है।

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1. जन्म, परिवार और वंश-परंपरा

जन्म

  • भाद्र कृष्ण षष्ठी, संवत् 1912 (1 सितम्बर 1855 ई.)
  • स्थान: दत्तापुर, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)

परिवार

  • पिता: पंडित गुरुचरणलाल उपाध्याय — विद्यानुरागी, कर्मनिष्ठ ब्राह्मण
  • कुल: सरयूपारीण ब्राह्मण, भारद्वाज गोत्र
  • उपाधि: खोरिया उपाध्याय

प्रेमघन ऐसे परिवार में जन्मे जहाँ अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत तथा फ़ारसी का अध्ययन स्वाभाविक वातावरण में होता था।

2. शिक्षा—भारतीय और पाश्चात्य शिक्षा का सुंदर संगम

प्रारंभिक शिक्षा

  • माता ने ही हिंदी वर्णमाला का ज्ञान कराया।
  • पिता ने घर पर फ़ारसी की शिक्षा दिलाई।

अंग्रेज़ी शिक्षा

बाद में उन्हें अंग्रेज़ी शिक्षा के लिए गोंडा (अवध) भेजा गया, जहाँ उनका परिचय कई प्रतिष्ठित ताल्लुकेदारों—

  • अयोध्यानरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह
  • महाराज उदयनारायण सिंह
  • लाला त्रिलोकीनाथ

से हुआ।

ताल्लुकेदारी संस्कार का प्रभाव

इस संयोग से प्रेमघन में विकसित हुए शौक—

  • मृगया
  • घुड़सवारी
  • गजसंचालन
  • निशानेबाजी

उच्च शिक्षा

संवत् 1924 के आसपास वे फैजाबाद उच्च अध्ययन हेतु गए, परंतु कुछ वर्षों बाद उन्हें पारिवारिक व्यवसाय संभालने हेतु पुनः मिर्जापुर लौटना पड़ा।

3. कविता और साहित्य की ओर झुकाव

पिता ने संस्कृत की शिक्षा हेतु पं. रामानंद पाठक को उनका शिक्षक नियुक्त किया। पाठक जी अत्यंत रसज्ञ और काव्यविशेषज्ञ थे।

इन्हीं के मार्गदर्शन से—

  • प्रेमघन में कविता के प्रति अनुराग जगा
  • छंद, रस और भाषा का बोध मजबूत हुआ
  • पहली पद्य-रचनाएँ इसी समय लिखीं

4. कलकत्ता प्रवास और उर्दू-फारसी साहित्य की ओर रुझान

संवत् 1928 में वे कलकत्ता गए, किन्तु वहाँ अस्वस्थ होकर लंबे समय तक बीमार रहे।
उसी समय उनकी मित्रता पं. इन्द्र नारायण सांगलू से हुई।

सांगलू—

  • शायरी प्रेमी
  • गजलों और नज़्मों के प्रेरक
  • उर्दू साहित्य के पारखी

उनके प्रभाव में आकर प्रेमघन ने—

✓ “अब्र” (तखल्लुस)

नाम से उर्दू-फ़ारसी ग़ज़लें, नज़्में और शेर लिखने शुरू किए।

5. भारतेन्दु हरिश्चंद्र से मैत्री—साहित्यिक जीवन की निर्णायक धुरी

सांगलू के माध्यम से प्रेमघन का संपर्क भारतेन्दु हरिश्चंद्र से हुआ।
मैत्री इतनी गहरी हुई कि—

  • प्रेमघन ने अपने व्यक्तित्व, वेशभूषा, आचरण तक भारतेन्दु का अनुसरण किया
  • भारतेन्दु मंडल में उनका प्रमुख स्थान बन गया
  • उनके निधन पर प्रेमघन ने अत्यंत मार्मिक कृति ‘शोकाश्रुबिन्दु’ लिखी

भारतेन्दु-प्रभाव ने उन्हें हिन्दी के सबसे सशक्त आलोचकों और गद्यकारों में स्थान दिलाया।

6. साहित्यिक संस्थाएँ और संपादन कार्य

वि.सं. 1930 – ‘सद्धर्म सभा’ की स्थापना

वि.सं. 1931 – ‘रसिक समाज’ की स्थापना

प्रमुख पत्रिकाओं का संपादन

  1. आनंदकादंबिनी — 1881
  2. नागरी नीरद — 1893

आनंदकादंबिनी के लिए उनके घर में ही ‘आनंदकादंबिनी प्रेस’ स्थापित किया गया।

इन पत्रिकाओं ने—

  • खड़ी बोली गद्य
  • आलोचना
  • साहित्यिक बहसों
  • लोकगीतों

को एक नई दिशा दी।

7. आचार्य रामचंद्र शुक्ल से संबंध

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार—

  • प्रेमघन उनके “साहित्यिक गुरु” थे
  • उन्होंने “खड़ी बोली गद्य” को पहली बार आलोचनात्मक शक्ति प्रदान की
  • प्रेमघन के निबंधों ने हिन्दी आलोचना को नया आधार दिया

शुक्ल जी उनके व्यक्तित्व को—
“विलक्षण वक्रता, चुस्त भाषा, मुहावरेदार गद्य”
का अद्भुत मिश्रण बताते हैं।

8. रचनाएँ : काव्य, नाटक, निबंध, आलोचना

(A) काव्य रचनाएँ

प्रेमघन की प्रमुख काव्य-कृतियाँ—

  1. जीर्ण जनपद / दत्तपुर दुर्दशा
  2. मयंक महिमा
  3. लालित्य लहरी
  4. आनंद अरुणोदय
  5. प्रेम पियूष वर्षा
  6. सूर्य स्त्रोत
  7. भारत बधाई
  8. पितर प्रताप
  9. हार्दिक हर्षादर्श
  10. अलौकिक लीला
  11. बृजचंद पंचक
  12. मन की मौज
  13. मंगलाशा
  14. वर्षा बिन्दु
  15. हास्य बिंदु
  16. युगल स्त्रोत
  17. आर्याभिनंदन
  18. प्रेम सर्वस्व (127 कविताएँ)

भाषा विशेषता

  • अधिकांश रचनाएँ ब्रजभाषा में
  • आनंद अरुणोदय और मयंक महिमा खड़ी बोली में

(B) नाट्य रचनाएँ

  1. भारत सौभाग्य
  2. वीरांगना रहस्य
  3. प्रयाग रामागमन

इन नाटकों में देशभक्ति, व्यंग्य, सामाजिक यथार्थ और मंच-कला का अद्भुत मिश्रण है।

(C) निबंध—250 से अधिक

प्रमुख निबंधों की श्रेणियाँ

वैयक्तिक निबंध

  • बनारस का बुढ़वा मंगल
  • समय
  • दिल्ली दरबार में मित्रमंडली के यार

विचारात्मक निबंध

  • नवीन वर्षारंभ
  • हिंदी भाषा का विकास
  • जन्मभूमि

भावात्मक निबंध

  • उत्साह आलंबन
  • मनोभाव आनंद

वर्णनात्मक निबंध

  • परिपूर्ण पावस

आलोचनात्मक निबंध

  • नेशनल कांग्रेस की दुर्दशा

शुक्ल जी का कथन

“हिन्दी में सच्ची समालोचना प्रेमघन और बालकृष्ण भट्ट से प्रारंभ हुई।”

9. भाषा और शैली

प्रेमघन की भाषा—

  • चुनिंदा देहाती मुहावरे
  • देहलवी उर्दू की झलक
  • फ़ारसी, अरबी के प्रभाव
  • चुस्त, परिष्कृत, चुटीली शैली
  • हास्य और व्यंग्य का अद्भुत संतुलन

वे खड़ी बोली गद्य के प्रथम आचार्य माने जाते हैं।

10. लोककाव्य और लोकगीतों में योगदान

उन्होंने—

  • कजली
  • चैती
  • होली
  • लोकगीत

की असाधारण रचनाएँ कीं, जो आज भी मीरजापुरी लोककला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
‘कजली कादंबिनी’ इसका प्रमाण है।

11. विशेष तथ्य

  • “कारे व गोरे” कविता अंग्रेजों के रंगभेद के विरोध में लिखी।
  • भारतेंदु पर “बेसुरी तान” शीर्षक आलोचनात्मक लेख लिखा।
  • उनकी रचनाओं का संकलन ‘प्रेमघन सर्वस्व’ नाम से प्रकाशित हुआ।
  • वे 68 वर्ष तक जीवित रहे — भारतेन्दु की उम्र से लगभग दोगुनी।

12. मृत्यु

12 मार्च 1922
फाल्गुन शुक्ल 14, संवत् 1978
(आयु: 68 वर्ष)

उनकी मृत्यु हिन्दी साहित्य के प्रथम उत्थान काल की एक गहरी क्षति थी।

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