बालकृष्ण भट्ट (जन्म: 3 जून 1844, इलाहाबाद – मृत्यु: 20 जुलाई 1914) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख निर्माता, गद्य कविता के प्रवर्तक, उत्कृष्ट नाटककार, तेजस्वी पत्रकार, सफल उपन्यासकार और सशक्त निबंधकार थे। आधुनिक हिन्दी साहित्य के विकास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इन्हें गद्य-प्रधान कविता का जनक भी कहा जाता है। हिन्दी पत्रकारिता में भी इनका स्थान अत्यंत ऊँचा है, विशेषकर उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘हिन्दी प्रदीप’ के कारण।
1. प्रारंभिक जीवन और परिवार
बालकृष्ण भट्ट का जन्म 3 जून 1844 को इलाहाबाद (प्रयाग) में एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ।
परिवार पृष्ठभूमि
- पिता: बेनी प्रसाद भट्ट – एक प्रतिष्ठित व्यापारी
- माता: पार्वती देवी – अत्यंत सुसंस्कृत महिला, जिन्होंने बचपन से ही भट्ट जी में अध्ययन और साहित्य के प्रति प्रेम जगाया
बाल्यावस्था से ही वे तीव्र बुद्धि, अध्ययनशील और साहित्य प्रेमी थे।
2. शिक्षा
बालकृष्ण भट्ट ने प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में प्राप्त की।
बाद में वे प्रयाग के मिशन स्कूल से जुड़े और—
- 1867 – एंट्रेंस परीक्षा उत्तीर्ण की
- 1869–1875 – इसी स्कूल में अध्यापक रहे
वे अंग्रेज़ी, हिंदी और संस्कृत—तीनों भाषाओं में प्रवीण हो गए थे।
3. अध्यापन कार्य
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने विभिन्न संस्थानों में अध्यापन कार्य किया:
- 1885 – प्रयाग के C.A.V. स्कूल में संस्कृत अध्यापक
- 1888 – प्रयाग के कायस्थ पाठशाला इंटर कॉलेज में नियुक्ति
किन्तु उनका स्वभाव अत्यंत स्पष्टवादी और उग्र था। सिद्धांतों के आगे वे कभी नहीं झुकते थे, इसी कारण उन्हें कई बार नौकरी छोड़नी पड़ी।
बाद में उन्होंने पूर्ण रूप से साहित्य और पत्रकारिता को ही जीवन बना लिया।
4. आर्थिक संघर्ष
पिता के निधन के बाद उन्हें गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।
पारिवारिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने साहित्य लेखन और पत्रकारिता को नहीं छोड़ा।
उनकी जिद, साहित्य प्रेम और राष्ट्रभक्ति ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी।
5. साहित्यिक परिचय (Literary Career)
1 भारतेन्दु युग में योगदान
बालकृष्ण भट्ट, भारतेन्दु हरिश्चंद्र के समकालीन और घनिष्ठ सहयोगी थे।
भारतेन्दु जी की प्रेरणा से ही उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन को दिशा दी।
हिन्दी के आधुनिक युग में वे एक प्रमुख स्तंभ बने।
2 ‘हिन्दी प्रदीप’ – 33 वर्ष तक चलायी पत्रिका
1877 में उन्होंने हिन्दी वर्धिनी सभा की ओर से ‘हिन्दी प्रदीप’ पत्रिका प्रकाशित की।
यह हिन्दी की प्रारंभिक, लोकप्रिय और प्रभावी पत्रिकाओं में से एक थी।
उन्होंने इसे लगातार 33 वर्षों तक चलाया, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
यह पत्रिका—
✔ हिन्दी भाषा की उन्नति
✔ सामाजिक सुधार
✔ राजनीतिक जागरूकता
✔ स्त्री शिक्षा
✔ साहित्यिक आलोचना
के लिए प्रसिद्ध रही।
3 आलोचना कार्य
- 1881 – उन्होंने वेदों की युक्तिपूर्ण समीक्षा की
- 1886 – लाला श्रीनिवास दास के संयोगिता स्वयंवर की कठोर आलोचना
उनकी आलोचना शैली तर्कपूर्ण, विद्वत्तापूर्ण और निर्भीक थी।
4 हिंदी शब्दकोश से जुड़ाव
जीवन के अंतिम दिनों में वे पंडित श्यामसुंदर दास द्वारा संचालित हिन्दी शब्दकोश के संपादन कार्य से जुड़े।
परंतु व्यवहारिक मतभेदों के कारण उन्हें कार्य छोड़ना पड़ा।
6. साहित्यिक रचनाएँ
1 उपन्यास
बालकृष्ण भट्ट हिन्दी के आरंभिक उपन्यासकारों में से एक हैं। उनके प्रमुख उपन्यास—
- सौ अजान एक सुजान
- नूतन ब्रह्मचारी
- रहस्य कथा
- गुप्त वैरी
- उत्तम दक्षिणा
- सद्भाव का अभाव
- रसातल यात्रा
- हमारी घड़ी
इन उपन्यासों में समाज-सुधार, सामाजिक विसंगतियों और मानव-चरित्र का सुंदर चित्रण मिलता है।
2 नाटक
भट्ट जी ने समाज-सापेक्ष नाटक लिखे जिनमें व्यंग्य, यथार्थ और संदेश का अद्भुत संयोजन मिलता है।
3 निबंध और पत्रकारिता
उनके निबंधों की विशेषताएँ—
- सरल भाषा
- तर्कपूर्ण शैली
- सामाजिक दृष्टिकोण
- स्पष्टवादिता
पत्रकार के रूप में वे बहुत प्रभावशाली थे।
‘हिन्दी प्रदीप’ ने हिन्दी समाज को नई दिशा दी।
7. भाषा और शैली
बालकृष्ण भट्ट की भाषा मुख्यतः—
- सरल खड़ी बोली
- संस्कृतनिष्ठ हिन्दी
- गंभीर लेकिन प्रवाहमय शैली
उन्होंने हिन्दी गद्य को आधुनिक, शक्तिशाली और समाजोन्मुख बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
8. व्यक्तित्व
वे—
- ईमानदार
- निडर
- राष्ट्रभक्त
- स्पष्टवादी
- अत्यंत परिश्रमी
व्यक्ति थे।
जीवन भर आर्थिक संघर्ष किए, पर साहित्य सेवा को कभी नहीं छोड़ा।
9. निधन
20 जुलाई 1914 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
वे अपने पीछे आधुनिक हिन्दी गद्य और पत्रकारिता की मजबूत नींव छोड़ गए।
