केशवदास (1555–1618 ई.) हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख कवि, महान आचार्य और हिंदी में संस्कृत काव्यशास्त्र पर आधारित रीति-परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी में कविता की कला को एक सुनियोजित, व्यवस्थित और शास्त्रीय रूप प्रदान किया।
उनकी रचनाओं में कला-पक्ष, अलंकार, नायिका-भेद, रस-विश्लेषण, और काव्य-शास्त्र का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
1. जन्म और परिवार
- जन्म: 1555 ईस्वी (कुछ विद्वान 1551–1561 के मध्य मानते हैं)।
- जन्मस्थान: ओरछा, मध्य प्रदेश
- परिवार: जिझौतिया ब्राह्मण
- पिता: पंडित काशीनाथ
- वंश परंपरा: ‘कविप्रिया’ में केशवदास ने स्वयं अपने वंश का विवरण दिया है।
विद्वानों के अनुसार:
| विद्वान | जन्म वर्ष |
|---|---|
| रामचंद्र शुक्ल | 1555 ई. |
| लाला भगवानदीन | 1559 ई. |
| मिश्र बंधु | 1555 ई. |
| सिंघल/ग्रियर्सन | 1567–1580 (कविकाल) |
2. शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
- केशवदास बचपन से ही संस्कृत काव्य, अलंकार शास्त्र, शास्त्र-वेद, संगीत, ज्योतिष और नीति-शास्त्र में निपुण थे।
- उन्होंने संस्कृत साहित्य का गहरा अध्ययन किया और उसकी शैली को हिंदी में ढालने का कार्य किया।
- वे स्वभाव से विनोदी, वाग्विदग्ध, निर्भीक, स्पष्टवादी और पांडित्य-गर्व से युक्त थे।
3. आश्रयदाता और दरबारी जीवन
मुख्य संरक्षक:
- ओरछा नरेश महाराज रामसिंह
- उनके पुत्र महाराज इंद्रजीत सिंह (केशवदास के विशेष आश्रयदाता)
- इंद्रजीत सिंह ने केशव को 21 गाँव जागीर में दिए और उन्हें कवि-गुरु, मंत्री और दरबारी विद्वान के रूप में सम्मान दिया।
अन्य संबंध:
- वीर सिंह देव (ओरछा के शासक)
- अकबर
- बीरबल
- टोडरमल
- उदयपुर के राणा अमरसिंह
- तुलसीदास (काशी यात्रा में भेंट)
केशवदास का समय दरबारी वैभव, राजनीतिक गतिविधियों और सांस्कृतिक समृद्धि से भरा हुआ था।
उन्होंने विलासमयी, समृद्ध और प्रभावशाली जीवन जिया।
4. आध्यात्मिकता और व्यक्तित्व
- उच्चकोटि के रसिक होने के बावजूद वे गहरे आस्तिक थे।
- धार्मिक, पाण्डित्यपूर्ण और नीति-निपुण व्यक्तित्व।
- कविता, संगीत, नीति, राजनीति, ज्योतिष, आयुर्वेद—सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट ज्ञान था।
5. मृत्यु
- केशवदास का निधन 1618 ईस्वी के आसपास माना जाता है।
- कुछ विद्वान 1617–1623 ईस्वी तक मृत्यु काल बताते हैं।
- वे अपनी वृद्धावस्था में काशी और गंगा तट पर रहकर लेखन और साधना में लीन रहे।
6. साहित्यिक योगदान
केशवदास हिंदी साहित्य में रीतिकाल के पहले आचार्य कवि और रीति-धारा के प्रवर्तक हैं।
उनकी काव्य-दृष्टि:
- भाव-पक्ष से अधिक कला-पक्ष को महत्व
- अलंकार, रस, छंद और काव्य-शास्त्र को नए रूप में प्रस्तुत किया
- हिंदी काव्य में संस्कृत शैली का सुंदर रूपांतर
प्रमुख कृतियाँ (Works of Keshavdas)
नीचे उनके सभी प्रमाणिक ग्रंथों की सूची दी गई है:
1) रसिकप्रिया (1591 ई.)
- रीतिकाल का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ
- नायिका-भेद
- श्रृंगार रस
- रस सिद्धांत
- प्रेम और सौंदर्य का काव्यात्मक विवेचन
2) कविप्रिया (1601 ई.)
- कविशिक्षा की पुस्तक
- अलंकार, छंद, रस—सबका विस्तृत वर्णन
- हिंदी का पहला काव्यशास्त्र ग्रंथ कहा जा सकता है
3) रामचंद्रिका (1601 ई.)
- रामकथा पर आधारित
- रामभक्ति के साथ काव्य-कला का चमत्कार
- उत्कृष्ट वर्णन शक्ति
4) वीरचरित्र / वीरसिंहदेव चरित्र (1606 ई.)
- वीर सिंह देव के जीवन और पराक्रम का वर्णन
- ओज, वीर रस, युद्ध विवरण
5) विज्ञान गीता (1610 ई.)
- वैराग्य
- दर्शन
- ज्ञान
- आत्मचिंतन
6) जहाँगीर जस चंद्रिका (1612 ई.)
- जहाँगीर दरबार का प्रभावशाली चित्रण
- अपने वृद्धावस्था का उल्लेख
7) रतन बावनी (रचना काल अज्ञात)
- रत्नसेन के वीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन
8) छंदमाला
- वर्णवृत्त और मात्रावृत्त दोनों का विशद विवरण
- हिंदी छंदशास्त्र की महत्वपूर्ण पुस्तक
7. अप्रामाणिक/संदिग्ध रचनाएँ
- जैमुनि की कथा
- बालचरित्र
- हनुमान जन्म लीला
- रस ललित
- अमी घूँट
विद्वानों के अनुसार ये रचनाएँ केशवदास की नहीं हैं।
8. केशवदास की काव्य- विशेषताएँ
- कला–पक्ष का समृद्ध रूप
- संस्कृत परंपरा का प्रभाव
- अलंकारों का विपुल प्रयोग
- श्रृंगार रस का श्रेष्ठ विवेचन
- छंदों का सौंदर्य
- नीति, राजनीति, धर्म, शास्त्रों का ज्ञान
- वर्णन शक्ति, उपमा, रूपक का सुंदर मिश्रण
- ब्रजभाषा का सुंदर, सुसंस्कृत रूप
9. केशवदास की साहित्यिक महत्ता
- हिंदी में आचार्य परंपरा के प्रथम प्रतिष्ठित कवि
- रीतिकाल के प्रवर्तक
- काव्यशास्त्र को हिंदी में प्रतिष्ठित करने वाले महान विद्वान
- उनकी रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं
उन्होंने ब्रजभाषा को शास्त्रीय गरिमा दी और उसे साहित्य की सर्वश्रेष्ठ भाषा के रूप में स्थापित किया।
