संत पीपा (Sant Pipa) मध्यकालीन भारत के उन महान संतों में से एक थे, जिन्होंने अपने राजसी जीवन को त्यागकर भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक पथ को अपनाया। वे एक समय राजस्थान के गागरोनगढ़ के शक्तिशाली राजा थे, लेकिन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत स्वामी रामानंद से प्रभावित होकर उन्होंने अपना राज्य, वैभव और अहंकार सब कुछ त्याग दिया। संत पीपा निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रवर्तकों में माने जाते हैं और उनके कई पवित्र पद “गुरु ग्रंथ साहिब” में भी संकलित हैं।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 14वीं–15वीं शताब्दी के मध्य
- जन्म स्थान: गागरोनगढ़ (राजस्थान)
- बचपन का नाम: राजकुमार प्रताप सिंह
- वंश: खींछी चौहान (क्षत्रिय शासक वंश)
- संत पीपा बचपन से ही वीर, प्रतिभाशाली और धर्मप्रिय थे। उनका पालन-पोषण राजा परिवार में हुआ और उन्हें युद्धकला, राजनीति और शासन की उच्च शिक्षा दी गई।
राजा के रूप में संत पीपा
युवा होने पर वे गागरोनगढ़ के राजा बने।
उनके शासनकाल की प्रमुख विशेषताएँ:
- वे एक वीर योद्धा थे और उन्होंने कई युद्धों में महारथ हासिल की।
- इतिहासकार उन्हें ऐसा शासक मानते हैं जिसने फिरोजशाह तुगलक जैसे शक्तिशाली योद्धाओं को भी पराजित किया था।
- वे अपनी प्रजा के प्रिय राजा थे और न्याय, सदाचार एवं धर्म की रक्षा को सर्वोपरि मानते थे।
राजा पीपा माँ दुर्गा के अनन्य भक्त थे और राजसी भव्यता के बावजूद उनमें आध्यात्मिकता की जिज्ञासा सदैव जागृत रहती थी।
आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर
राजसी जीवन के बीच संत पीपा के मन में ईश्वर-साक्षात्कार की लालसा बढ़ती गई। इसी खोज में उन्हें भक्ति आंदोलन के महान संत स्वामी रामानंद के दर्शन प्राप्त हुए।
रामानंद से दीक्षा
- रामानंद ने उन्हें निर्गुण भक्ति का मार्ग दिखाया।
- उनके उपदेशों ने राजा पीपा के हृदय को गहराई से प्रभावित किया।
- उन्होंने निर्णय लिया कि वे सांसारिक मोह-माया और राज्य को छोड़कर ईश्वर की भक्ति करेंगे।
सिंहासन परित्याग
राजा पीपा ने:
- अपना सिंहासन,
- राजसी सुख-सुविधाएँ,
- वैभव,
- और अपार संपत्ति
सब कुछ त्याग दिया और भक्ति मार्ग में प्रवेश कर लिया। अपनी पत्नी सीता देवी के साथ उन्होंने तपस्या और साधना का जीवन अपनाया।
संत पीपा का त्यागमय जीवन
सिंहासन छोड़ने के बाद संत पीपा ने एकांत साधना और अंर्तमंथन का मार्ग अपनाया।
- वे राजस्थान के जालोर, बाड़मेर, टोडा (टोंक) जैसे क्षेत्रों में रहे।
- उन्होंने जीवनभर सादगी, तपस्या, ध्यान और प्रेम-भक्ति का मार्ग अपनाया।
- संत पीपा कबीर, सेन, धन्ना, रैदास जैसे संतों की पंक्ति में माने जाते हैं।
उनकी भक्ति मुख्यतः:
- निर्गुण भक्ति,
- समाज में समानता,
- ईश्वर से सीधा संबंध,
- अहंकार त्याग,
- और आंतरिक शांति
पर आधारित थी।
संत पीपा की रचनाएँ
संत पीपा ने आध्यात्मिक भक्ति पर कई पद और ग्रंथ लिखे।
मुख्य रचना
- चिंतावणी जोग (Chintavani Jog)
यह उनकी प्रमुख रचना है जिसमें आध्यात्मिक साधना, योग और भक्ति का सुंदर समन्वय मिलता है।
गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल पद
संत पीपा के कुछ पद इतने उच्च कोटि के हैं कि वे सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल किए गए हैं।
यह उनके काव्य और आध्यात्मिक ऊंचाइयों का प्रमाण है।
भक्ति संदेश और दर्शन
संत पीपा के विचार अत्यंत गहरे और व्यावहारिक थे।
उनकी शिक्षाएँ बताती हैं:
- ईश्वर हर हृदय में है, बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं।
- जाति, धर्म, रिवाज़—इन सब की सीमाएँ भक्ति के सामने छोटी हैं।
- सच्चा धर्म प्रेम, सेवा और विनम्रता है।
- राजसी अभिमान सत्य के मार्ग में बाधा है।
- भक्त को अहंकाररहित तथा मन से निर्मल होना चाहिए।
उनकी निर्गुण भक्ति परंपरा ने राजस्थान, गुजरात, पंजाब और उत्तर भारत में नई आध्यात्मिक चेतना जगाई।
अंतिम समय और निधन
- संत पीपा ने अपना अंतिम जीवन टोडा (टोंक, राजस्थान) में बिताया।
- उन्होंने एक गुफा में ध्यान करते हुए अपना जीवन समाप्त किया।
- उनका निधन चैत्र कृष्ण नवमी को हुआ माना जाता है।
- आज भी यह स्थान “पीपाजी की गुफा” के नाम से प्रसिद्ध है।
