परिचय
संत नामदेव (Namdev/Namdeo) 13वीं–14वीं शताब्दी के भारत के महान संत, कवि, समाज सुधारक और वारकरी भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभों में से एक थे।
वे भगवान विठ्ठल (कृष्ण के अवतार) के अनन्य भक्त थे और अपने अभंग, भजन और कीर्तन के माध्यम से पूरे भारत में भक्ति का संदेश फैलाते रहे।
संत ज्ञानेश्वर के घनिष्ठ मित्र और समकालीन, नामदेव ने भक्ति आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके कई भजन सिख धर्मग्रंथ “गुरु ग्रंथ साहिब” में भी शामिल हैं, जो उनकी आध्यात्मिक ऊँचाई का प्रमाण है।
1. जन्म और प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 1270 ईस्वी (अनुमानित)
- जन्म स्थान: नरसी-बामनी, महाराष्ट्र (नांदेड़ जिले के पास)
- पिता: दामाजी शेट
- माता: गोणाबाई
- कुल/पेशा: दर्जी (शिंपी) जाति
नामदेव बचपन से ही अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के थे। कहा जाता है कि वे पाँच वर्ष की उम्र में ही विठ्ठल मंदिर जाकर प्रतिदिन पूजा-अर्चना करते थे।
उनका बालमन भगवान विठोबा (विठ्ठल) में इतना रम गया था कि माता-पिता को चिंता होती थी कि यह बालक सांसारिक कार्यों में कैसे समायोजित होगा।
2. भगवान विठ्ठल के प्रति अनन्य भक्ति
संत नामदेव को विठ्ठल का “प्रिय भक्त” कहा जाता है।
कई कथाओं के अनुसार—
- वे प्रतिदिन विठ्ठल के आगे भोजन चढ़ाते थे।
- और कहा जाता है कि विठ्ठल स्वयं प्रकट होकर उनका भोग स्वीकार करते थे।
- उनकी भक्ति में निष्कपट प्रेम और समर्पण का अद्भुत मिश्रण था।
नामदेव – भक्त और भगवान का स्नेह संबंध
नामदेव और विठ्ठल के संबंध को मित्रता, प्रेम और भक्ति का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है।
कई कथाओं में विठ्ठल ने भक्त की रक्षा के लिए असंभव कार्य किए, जो आज भी वारकरी परंपरा में गाए जाते हैं।
3. संत ज्ञानेश्वर के साथ आध्यात्मिक यात्रा
संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) के बहुत निकट थे।
दोनों ने महाराष्ट्र से उत्तर भारत तक तीर्थयात्राएँ कीं और जगह-जगह भक्ति का संदेश फैलाया।
ज्ञानेश्वर और नामदेव – दो महान संतों की जोड़ी:
- दोनों ने निराकार (निर्गुण) और साकार (सगुण) भक्ति का समन्वय प्रस्तुत किया।
- नामदेव की आध्यात्मिक ऊँचाई को ज्ञानेश्वर ने बहुत सम्मान दिया।
- कहा जाता है कि ज्ञानेश्वर ने नामदेव को “सच्चे संत” की उपाधि दी।
4. वारकरी संप्रदाय में योगदान
संत नामदेव ने वारकरी परंपरा को मजबूत आधार दिया।
वारकरी संप्रदाय का मुख्य सिद्धांत है:
- विठ्ठल भक्ति
- सत्य, सरलता और समानता
- कीर्तन, भजन, अभंग
नामदेव ने अपने अभंगों के माध्यम से भक्ति आंदोलन को महाराष्ट्र से लेकर पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक फैलाया।
5. उत्तर भारत की यात्रा और गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मान
संत नामदेव लगभग 20 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे।
उन्होंने—
- पंजाब
- राजस्थान
- उत्तर प्रदेश
- हरियाणा
में भक्ति का प्रचार किया।
यही कारण है कि गुरु नानकदेव जी, गुरु अर्जुन देव और अन्य सिख गुरुओं ने भी नामदेव की भक्ति को अत्यंत आदर दिया।
गुरु ग्रंथ साहिब में नामदेव जी
गुरु ग्रंथ साहिब में 61 भजन संत नामदेव के शामिल हैं।
यह किसी गैर-सिख संत के लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
6. संत नामदेव की आध्यात्मिक मान्यताएँ
संत नामदेव की भक्ति दो रूपों में थी—
1️⃣ सगुण भक्ति – एक व्यक्तिगत ईश्वर की पूजा
वे विठ्ठल को अपने आराध्य देव के रूप में पूजते थे।
2️⃣ निर्गुण भक्ति – निराकार, सर्वव्यापी ईश्वर का स्वरूप
वे मानते थे कि—
- परमात्मा हर स्थान पर है
- उसके बिना यह संसार अपूर्ण है
- जाति, धर्म, वर्ण का कोई अंतर नहीं
मुख्य शिक्षाएँ
- ईश्वर प्रेम से प्रसन्न होता है, कर्मकांड से नहीं।
- जाति-पाति का कोई महत्व नहीं है।
- परिश्रम, दया और सत्य ही धर्म हैं।
- सभी मनुष्य समान हैं।
- प्रभु का नाम ही जीवन का सहारा है।
7. संत नामदेव साहित्य और रचनाएँ
नामदेव की रचनाएँ “अभंग” कहलाती हैं।
उनकी भाषा—
- सरल मराठी
- पंजाबी
- हिंदी
- सीमा क्षेत्रों की लोकभाषा
थी।
मुख्य साहित्यिक योगदान
- 3000+ अभंग
- 61 भजन (गुरु ग्रंथ साहिब में)
- भक्ति-भाव से भरे कीर्तन
उनकी कविता हृदय से निकली हुई, सरल और अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है।
प्रमुख अभंग
- “आता रंजी झाकली”
- “तुका म्हणे हो”
- “नामाचा गजर”
- “विठ्ठल विठ्ठल जप”
8. मृत्यु (समाधि) और विरासत
- समाधि स्थान: वर्धा नदी तट, गोंदावली (महाराष्ट्र)
- समय: 1350 ईस्वी के आसपास
