परिचय
मीराबाई भारतीय भक्ति आंदोलन की सबसे प्रमुख और लोकप्रिय संत-कवयित्रियों में से एक थीं। वे श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अटूट भक्ति, दिव्य प्रेमभाव और मधुर पदों के कारण आज भी पूरी दुनिया में पूजी जाती हैं।
उनकी रचनाएँ, जीवन अनुभव और त्याग ने उन्हें भक्ति साहित्य की अमर प्रतीक बना दिया है।
मीराबाई की भक्ति सगुण भक्तिमार्ग से संबंधित थी, जिसमें भगवान को रूप, गुण, व्यक्तित्व और स्नेह से युक्त मानकर उनकी उपासना की जाती है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
मीराबाई का जन्म 1498 ईस्वी के आसपास राजस्थान के मेड़ता के पास कुड़की गाँव में एक राजपूत राजघराने में हुआ था।
उनके पिता राव रतन सिंह और पितामह राव दूदा जी थे, जो मेड़ता क्षेत्र के प्रतिष्ठित शासक माने जाते थे।
राजघराने में जन्म लेने के कारण मीरा बचपन से ही ऐश्वर्य, संस्कृति और परंपराओं से घिरी थीं, लेकिन उनके हृदय में छोटी आयु से ही श्रीकृष्ण के प्रति विशेष प्रेमभाव था।
कहते हैं कि छह वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार श्रीकृष्ण की मूर्ति से गहरा संबंध महसूस किया और तभी कृष्ण को अपना प्रियतम मान लिया।
विवाह और प्रारंभिक जीवन की परिस्थितियाँ
मीराबाई का विवाह उदयपुर के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ था।
भोजराज एक शूरवीर और उच्च कुलीन राजकुमार थे, परंतु उनकी वैवाहिक जीवन में मीरा ज्यादातर कृष्ण भक्ति में ही लीन रहीं।
✔ पति भोजराज का निधन
विवाह के कुछ समय बाद ही भोजराज का निधन हो गया।
यह घटना मीरा के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई, जिसने उन्हें पूरी तरह कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया।
कृष्ण भक्ति का मार्ग
पति की मृत्यु के बाद मीरा ने राजसी बंधनों और सामाजिक परंपराओं से ऊपर उठकर खुद को श्रीकृष्ण की भक्ति में डुबो दिया।
✔ भक्ति की विशेषताएँ
- वे दिन-रात कृष्ण के भजन गातीं
- मंदिरों में नृत्य करतीं
- लोकलाज की परवाह किए बिना कीर्तन में लीन रहतीं
- कृष्ण को अपना पति, मित्र और भगवान—सभी मानती थीं
उनकी भक्ति प्रेममय भी थी और विरह से भरी भी, जिसे पढ़कर आज भी पाठक भावविभोर हो जाते हैं।
आध्यात्मिक गुरु – संत रैदास (रविदास)
मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु महान संत रैदास (रविदास) थे।
रैदास जी के सत्संग ने मीरा की भक्ति को और भी गहन, सरल, निर्भीक और समाज-सेवी बना दिया।
मीराबाई का त्याग और संघर्ष
मीराबाई की कृष्ण भक्ति से राजपरिवार और समाज अक्सर असहज रहता था, क्योंकि—
- वे नारी की पारंपरिक सामाजिक सीमाओं से बाहर थीं
- राजघराने की मर्यादा में रहते हुए भी भक्तिपथ पर दृढ़ थीं
- वे कृष्ण को अपना सर्वस्व मानती थीं
कई बार उन पर प्राणघातक षड्यंत्र किए गए, जैसे—
- विष का प्याला
- विषैली सांप की टोकरी
- लोहे की कील वाला बिस्तर
लेकिन कथाओं के अनुसार, उन्हें श्रीकृष्ण की कृपा ने हर बार बचा लिया।
मीरा की रचनाएँ और साहित्यिक योगदान
मीराबाई की काव्य रचनाएँ भक्ति、प्रेम、विरह और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण हैं।
उनकी भाषा सरल, भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी है।
उनकी प्रमुख रचनाएँ / पद:
- बरसीने की राधिका
- नरसी जी रो माहेनो
- गीत-गोविंद से प्रेरित कई पद
- अनेक भक्ति भजन जो राजस्थानी और ब्रजभाषा में प्रसिद्ध हैं
उनके पदों में कृष्ण के प्रति प्रेम की अनूठी छटा देखने को मिलती है, जैसे—
- “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो”
- “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई”
- “मैं तो सांवरिया के रंग राची”
ये पद आज भी मंदिरों, कीर्तन, लोकगीतों और भारतीय संस्कृति में अमर हैं।
मीरा की भक्ति की विशेषताएँ
✔ सगुण भक्ति
वे कृष्ण को रूप और नाम सहित पूजती थीं।
✔ निर्भीकता
उन्होंने लोकलाज की परवाह किए बिना कृष्ण को अपना पति मान लिया।
✔ विरह और प्रेम
उनकी कविता में प्रेम का माधुर्य और विरह का दर्द खूबसूरती से मिलता है।
✔ सादगी और सहज भाषा
उनकी रचनाएँ ग्रामीण, लोकभाषा और सरल भावों से भरी होती हैं।
✔ सामाजिक संदेश
उन्होंने ऊँच-नीच, भेदभाव और रूढ़ियों का विरोध किया।
मृत्यु (निर्वाण)
माना जाता है कि 1546 ईस्वी में मीराबाई ने द्वारिका के रणछोड़ मंदिर में देह-त्याग किया।
लोककथाओं के अनुसार, वे कृष्ण की मूर्ति में लीन होकर भगवान में समा गईं – जो उनकी दिव्य भक्ति का चरम रूप माना जाता है।
मीराबाई का प्रभाव और महत्व
मीराबाई सिर्फ एक कवयित्री नहीं थीं—वे भारत के भक्ति आंदोलन की आत्मा थीं।
उनका महत्व:
- मध्यकालीन भक्ति साहित्य को नई दिशा दी
- स्त्री स्वतंत्रता और आध्यात्मिक आज़ादी की प्रतीक बनीं
- भक्तिकाव्य में माधुर्य भक्ति की सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता
- भारतीय संगीत, लोककला और भजनों पर आज तक प्रभाव
उनकी भक्ति और पद आज भी विश्व के करोड़ों लोगों को भक्ति मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।
